असमंजस

असमंजस। घोर असमंजस। उलझन। कैसे सुलझाऊँ ये डोर? हर दिन उठते ही अपने आप को इसी में उलझा हुआ पाता हूँ। खैर, बमुश्किल जोड़-तोड़ कर इसे एक सलंग कर लेता हूँ।

लेकिन पतंग कैसे उड़ेगी यह? जो अभी तक ज़मीन पर ही चिपकी है! अरे, कोई हवा डालो। फूंकें मारो। और कुछ नहीं तो पल्लू ही हिलाओ। इसे उड़ाने में मेरी मदद करो!

क्या? पतंगें ऐसे नहीं उड़ा करतीं? क्यों लेकिन?

फिर असमंजस। घोर वाला।