समय कितना बदल जाता है. पीछे के पीपल के पत्ते उन दिनों नये आये थे. बसंती बयार थी. चटक हरे रंग के पत्ते आँखों को बड़ा सुकून देते थे. शाम को पढाई की मेज के पास बैठा अक्सर उन पत्तों को हवा के प्रभाव से आपस में टकराते देखता था. ऐसा लगता था मानो पूरी दुनिया की शाम इन पत्तों के टकराने में ही गुजर रही है. बाकी सारी दुनियादारी झूठी है. एक जरा सी बात में कितनी क्रिया-प्रतिक्रिया शामिल होती है. सारी सृष्टि के नियम-कायदे लगे होते हैं.
उन दिनों समय बहुत ‘पतला’ लगता था. समय के सूत से जैसे पल का रेशा-रेशा ही निकलता था. एक ही रेशे से सारी सृष्टि ‘बुनती’ जाती थी. कितनी सृष्टियाँ तो जैसे मेरी आँखों के सामने उसी शाम नाचने लगती थीं. वो बहुत बड़ी शाम होती थी.
अब समय बदल गया है. चरखा तेज़ घूमने लगा है. सूत का धागा बन गया है. रेशे अब नज़र नहीं आते. सृष्टि न जाने कैसे चल रही है. लेकिन वो पत्ते आज भी हरे हैं.
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