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वो पत्ते आज भी हरे हैं
समय कितना बदल जाता है. पीछे के पीपल के पत्ते उन दिनों नये आये थे. बसंती बयार थी. चटक हरे रंग के पत्ते आँखों को बड़ा सुकून देते थे. शाम को पढाई की मेज के पास बैठा अक्सर उन पत्तों को हवा के प्रभाव से आपस में टकराते देखता था. ऐसा लगता था मानो पूरी…
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सरफिरापन
सरफिरापन। पूरी तरह से सरफिरा नहीं। बस थोड़ी सी झलक। आपके अंदर के पागलपन की। आपके मैं-ऐसा-ही-हूँ-पन की नुमाइश। इसको कहेंगे सरफिरापन। आपके द्वारा किए गए कामों में झलकने वाला। इनकी अदायगी में दिखने वाला। ऐसा सरफिरापन। बहुत काम का है ये !
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असमंजस
असमंजस। घोर असमंजस। उलझन। कैसे सुलझाऊँ ये डोर? हर दिन उठते ही अपने आप को इसी में उलझा हुआ पाता हूँ। खैर, बमुश्किल जोड़-तोड़ कर इसे एक सलंग कर लेता हूँ। लेकिन पतंग कैसे उड़ेगी यह? जो अभी तक ज़मीन पर ही चिपकी है! अरे, कोई हवा डालो। फूंकें मारो। और कुछ नहीं तो पल्लू…
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कहानियाँ
हमारे इर्द-गिर्द हर समय असंख्य कहानियाँ बन रही होती हैं। इनका अपना ही एक रास्ता, अपना ही एक कारवां होता है। रास्ते-भर वे बनती-बिगड़ती रहती हैं। जब कभी वे पहली बार कही जाती हैं, तब किसी को नहीं पता होता कि ये कहानियाँ कितनी दूर तक फैलेंगी। जैसे गंगोत्री को नहीं पता रहता, कि गंगा…
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समय नहीं रहेगा
कोई दसियों बरस बाद शहर को क़रीब से देखने निकला। ग़ौर किया तो पाया कि घरों के बरामदे गुम हो चले हैं। और उन बरामदों में दोपहर के वक्त पड़ने वाली वो मझली-सी धूप भी। अब वहां छांव ही छांव है। अंधेरे का आभास न हो, इसके लिए एक छद्म रोशनी कर रखी है। वक्त-बेवक्त…
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अनकहा
शामों को कौन कहता है कि वे क्षितिज पर अपनी नारंगी छटा बिखेरें? कौन सूरज को आदेश देता है कि वह अपनी विदाई को सुर्ख रंगों में रंग दे? हवा को कौन बताता है कि वह मंद होते प्रकाश में धीमे-धीमे बहने लगे, और पत्तों को कौन सिखाता है कि वे हल्की सरसराहट के साथ…